अंबर घिरा
घन झन झन बाजे
व्यथा विरह गीत
गहन अकुलाते
कहां प्रिय
विरहिणी बरखा सोखे
बूंद गिरे स्वाति
तब भी चातक तरसे।
कितनी प्रतीक्षा
क्या प्रिय पथ को भूले
कब आओगे
नयन मेघ संग द्वंद करे।
नयन विजेता
घन ही हारे
तभी बरखा में ही
प्रिय संदेश मिला
व्याकुल हृदय अब पंथ निहारे।
(2)
परम पावन
पावस पयोद
प्रिय आगमन
प्रतीक्षा अंत
सुमन सुगंध
झर झर धरती
महके
विद्युत झूमे
विटप लहराए
मयूर अलाप
हिय प्रेम जगाए
तड़ित गरज
आकाश चमक
प्रभा घनी
भय दूर झटक
जब प्रिय निकट
सरिता जल विहस इठलाए
जल तरंग मधुर संगीत बजाए
मेघ सौंदर्य
धरा हरित वसन फैलाए
उर स्पंदन अलौकिक
नाद सुनाए।।
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