क्या तुम भूल गए, माता अनुसूया के उसूलों को,
लगता है, तुम भूल गए, सप्तऋषि अत्रि के आदर्शों को|
क्या तुम भूल गए, त्रेता युग के भारतवर्ष के एहसानों को,
लगता है, तुम भूल गए, भारतवर्ष कि पहचानों को|
मैं तो ठहरा विक्रम, माँ का संदेशा लाया था,
कई लक्ष तय कर, तुमसे मिलने आया था|
माना कि मखमली धरा देख, तुमसे मिलने दौड़ गया,
पर सच यह है, थक हार कर विक्रम, माँ की याद में दौड़ गया|
मां सोचती होगी, चन्द्रमा कि मख़मली चादर पर, विक्रम आराम से सोता होगा,
पर क्या घायल विक्रम, माँ को याद कर रोता होगा|
काश तुम अपनी बाहु, अभ्यागत में फैलाए होते,
वसुंधरा के लाल को, संभाल पाए होते|
तू तो ठहरा चाँद, नखरे तो दिखाएगा ,
भारतवर्ष का वो दिन, तुम्हारे धरा को छू, अतीत याद दिलाएगा|
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