आज उमड़ उमड़ कर
बादल आ रहें हैं।
शीतल पुरवाई छूकर तन को,
अनकहा महसूस कराती हुई।
कड़कती बिजलियां
संग गर्जना का अनुभव परंतु
अब ये सब अच्छा नहीं लगता।
एक वो समय था, बचपन का
जब होती थी बरसातें गांवों में,
गलियारों में दौड़ते नंगें पांव।
वो कागज़ की नैया,
वो माटी के महल,
खूब नाचते नहाते।
छाता लिए काका की,
डांट फटकार के बाद हुर्रे की आवाजें।
कहां सुनाई देती हैं,
शहरों के शोरगुल में।
आज न तो गलियारें हैं,
न कागज़ की नैया।
हां बालक हैं लेकिन
उनका भी वो बचपन नहीं।
बचपन की अठखेलियों को,
इस आधुनिकता ने छीन लिया।
हाथ में थमा दिए मोबाइल,
लुडो, पब्जी तक सीमित रिश्ते।
आंख भर आती हैं,
जब आती हैं, सावन की यादें।।
सत्यनारायण_रेगर
चित्तौड़गढ़ राजस्थान
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