एक समय था जब हम सोने की चिड़िया कहलाते थे
घर घर महल समान यहां था उत्सव रोज मनाते थे
पहले शल्य चिकित्सु सुश्रुत हम ही पहले अध्येता थे
सारा विश्व जितने वाले हम ही प्रथम विजेता थे
हमने गणेश के कटे हुए धड़ में हाथी का सर जोड़ा
हमने ही पुष्पक विमान से, सूर्य को भी पीछे छोड़ा
हममें बैठे बैठे ही सूरज चंदा सब पता किया
किसकी कितनी चाल दिशा स्थान दूरी सब बता दिया
आर्यभट्ट ने शून्य दिया दुनिया को गणित सिखा
गुरु चाणक्य ने अर्थशास्त्र की नीति दिव्य बतलाई
ऋषियों ने निज मेधा से सब संभव कर दिखलाया
कपिल मुनि ने सांख्य शास्त्र का ज्ञान हमें बतलाया
पतंजलि ने योगशास्त्र में निज जीवन का हवन किया
गौतम मुनि ने प्रखरबुद्धि से न्यायशास्त्र का सृजन किया
हमने गुरुकुल केंद्र बनाया विविध कलात्मक शिक्षा का
वैश्विक गौरव तक्षशिला नालंदा जैसी निधियों का
वैदिक शिक्षा ने मानव उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया
ब्रिटिश हुकूमत के सूरज को हमने ही अस्त किया
ऐसी भारत पुण्य भूमि की रज से चंदन करता हूं
शेखर सुभाष अशफाक भगत को शत शत वंदन करता हूं
- सीताकान्त स्वयंभू
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