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जिया तड़पे रे शाम सकारे

                
                                                         
                            गीत
                                                                 
                            

जिया तड़पे रे शाम सकारे
सूने लागे हैं नैन हमारे
कैसे कटे ये बिरहा की रतियां
कोई तो जाके पी को पुकारे
जिया तड़पे रे शाम सकारे

सूना है घाट और बहती है नदिया
लहरों से पूछे ये मेरी उमरिया
नाव किनारे पे कोई न माझी
किसको दिखाऊँ मैं रोती गुज़रिया
पनघट पे अब तो दर्द पखारे
सूने लागे हैं नैन हमारे

कारे बदरवा जो बरसन लागे
सूने आँगन में ये बिरहा रे जागे
दादुर पपीहा की बैरन ये बोली
तीर विरह के छाती में दागे
सावन भी अब तो आग लगाये
सूने लागे हैं नैन हमारे

राह निहारूँ मैं प्यासी नज़र भर
तपती सी धूप और छाई उदासी
कोई न राही दिखे इस सफ़र पर
उम्मीदों के भी टूटे सितारे
सूने लागे हैं नैन हमारे

बुझने को आया ये दीपक हमारा
भोर हुई पर मिला न सहारा
छत पे खड़ी मैं तो जोहूँ डगरिया
टूटा है जैसे गगन से सितारा
साँसें भी अब तो रस्ता निहारे
सूने लागे हैं नैन हमारे
जिया तड़पे रे शाम सकारे

- भानु शर्मा रंज
कवि एवं गीतकार
धौलपुर राजस्थान
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2 सप्ताह पहले

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