*मेरा अपना घर*
जहाँ जन्म लिया,
क्या वो मेरा घर है?
या मेरा ससुराल मेरा घर होगा?
जो खरीदा, क्या वो मेरा घर होगा?
या जो पहचाना, जो अपनाया,
वो मेरा घर होगा?
उठ रहे हैं अनेकों प्रश्न आज हृदय में—
बीत गया मुग़ल राज,
भाग गए अंग्रेज़ भारत से,
पर क्या आज भी हमारा कोई हक़ है?
क्या लड़कियों का अपना कोई घर होता है?
या शादी तक पिता का,
विवाह के बाद पति का,
फिर वही पुत्र का हो जाता है?
क्या उस लड़की का कोई घर नहीं होता?
शायद नहीं,
क्योंकि आज घर तो वो है
जिसपर हम हक़ से रह सकें,
जहाँ हमें पराया धन न समझा जाए,
जहाँ हमें बाहरी व्यक्ति की तरह न देखा जाए।
घर तो वो है
जहाँ मन को शांति
और हृदय को सुख मिले,
जहाँ सब प्रभु का हो
और हम उनके हों।
और लड़कियों के लिए तो घर वो होना चाहिए
जहाँ उनका अपना वजूद हो,
जहाँ उनके अधिकार हों,
अपने नियम और अपने सपने हों।
सिर्फ़ कहने का घर नहीं,
बल्कि अपनी मेहनत से लिया हुआ
ख़ुद का घर हो।
क्योंकि तभी वो
सही मायने में गृहलक्ष्मी कहलाएगी,
उसकी ख़ुद की पहचान होगी,
हौसलों की उड़ान होगी।
और सबसे बड़ा घर
तो वो मंदिर है
जो सदैव हमारे अंदर बसता है।
अरे, घर तो वो मंदिर है
जहाँ प्रभु स्वयं निवास करते हैं।
घर तो वो कवच है
जो हमें जीवन के हर आँधी-तूफ़ान से बचाता है,
और नाथ उसकी छत,
जो उसे हमेशा थामे रखते हैं।
घर ही मंदिर,
और मंदिर ही घर है।
जहाँ रहते हैं मेरे प्रियतम,
वो घर ही सर्वस्व है।
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