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वक़्त की साठगांठ

                
                                                         
                            दिनों की जेब में बस अब *पचहत्तर सिक्के* बाक़ी हैं,
                                                                 
                            
खनकते हैं... तो दिल कहता है कुछ सामान कर लें हम,
ये साल अपनी ढलती उम्र की दहलीज़ पर बैठा,
इशारे से बुलाता है,
कि इससे पहले ये तारीख़ का हिस्सा बने...
चलो, कुछ काम कर लें हम!

बड़ी मुद्दत से दिल के एक कोने में,
कोई ख़्वाहिश दबी-सी, साँस लेती थी,
कि अपनी नौकरी, इस रोज़ की आपा-धापी से,
ज़रा-सी धूप चुराकर,
ख़ुद अपनी एक छोटी-सी दुकाँ-ए-शौक़ खोलें हम,
हुनर को अपने, दुनिया के हवाले करके देखें हम।

ये जो दो-चार हफ़्ते हैं,
ये जो ढलती हुई-सी साल की मद्धम दुपहरी है,
ये कहती है कि कोरे पन्नों पर कुछ नाम लिख लें हम,
कोई हसल, कोई ज़रिया, कोई रस्ता नया ढूँढें,
कि जब छब्बीस (2026) का सूरज,
दिसंबर की रजाई ओढ़कर सोए...
तो अपनी आँख में इक मुतमइन-सी नींद बाक़ी हो,
कि हमने इस बरस, ख़ुद से कोई वादा निभाया है।

चलो, इस ढलते साल की आख़िरी नज़्म को,
एक नई शुरुआत का उनवान देते हैं...
पचहत्तर दिन बहुत होते हैं,
ख़ुद से ख़ुद की जान-पहचान करने को!
-कपिल देव जुल्का
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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