विकास का साया
शहर के कंधों पर चढ़कर,
विकास जब पाँव रखता है,
तो दूर किसी अल्हड़ गाँव की—
पगडंडी का दिल दुखता है।
लोहे के बड़े-बड़े गर्डर,
सीने ताने खड़े हुए,
और सहमी-सी नदियाँ गुमसुम,
पुल के नीचे पड़ी हुईं।
पानी पर तैरती परछाईं,
धुएँ और राख की परतें हैं,
मछलियाँ किनारे आकर अब,
बस एक ही सवाल करती हैं।
चौंधिया गई हैं आँखें सब,
इस नई रोशनी के आगे,
चौखट से बिछड़ गए बूढ़े—
दरवाज़े और पुराने धागे।
हाँ, रातें ख़ूब चमकेंगी,
सड़कें भी दौड़ेंगी आगे,
पर नीचे दबी हुई मिट्टी—
रोएगी रो-रोकर जागे।
पालकी विकास की सजेगी,
पर दर्द भी संग में आएगा,
एक साए की तरह चुपके से,
पीछे-पीछे चल जाएगा।
-कपिल देव जुल्का
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