पहले काग़ज़ की आस थी,
तो काग़ज़ नहीं था,
अब काग़ज़ है,
तो लिखने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं हैं।
क्या ही लिखूँ इस ज़िंदगी के बारे में,
जिसका कोई साज़ नहीं है,
हर धुन अधूरी-सी है,
हर गीत में आवाज़ नहीं है।
कभी लफ़्ज़ों में दुनिया बसा लेते थे,
अब ख़ुद से कहने को भी कुछ ख़ास नहीं है,
काग़ज़ सामने पड़ा है ख़ामोश,
और दिल में भी कोई राज़ नहीं है।
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