ना बिके इंसान अब बाजारों में कहीं,
ना हो तस्करी, ना मजबूरी की गिनती वहीं।
अनुच्छेद तेईस कहे ऊँची पुकार,
बेगार नहीं अब कोई व्यवहार।
जिस श्रम में हो वेतन का अपमान,
वह अपराध है, नहीं सामान्य विधान।
जो जबरन करवाए किसी का काम,
वह काटे अपने कर्मों का दाम।
चौबीस कहे, सुन ले हर देश,
बचपन न जाए श्रम के आवेश।
चौदह बरस से कम का बाल,
न खदान, न कारखाने का हाल।
बचपन का हक़ है खेलना-सीखना,
सपनों का दीप सच्चाई में दीखना।
ये अधिकार रक्षक हैं मानव सम्मान के,
संविधान के दीपक, उजले अरमान के।
यदि दिखे कहीं शोषण का दृश्य,
उठो, करो न्याय का निश्चय।
कानून, आयोग, या सेवा-मित्र बुलाओ,
कमज़ोर की आवाज़ बन जाओ।
भारत कहे – न झुके, न टूटे,
जहाँ श्रम हो, वहाँ सम्मान फूटे।
शोषण से मुक्ति का ये अधिकार,
हर नागरिक का गर्वीला आधार।
-कन्हैया लाल मीणा
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