नींद से उठकर
जब मैंने आंखें खोली
खिड़की पर एक चिड़िया
तब चहचाहकर
लगा मुझसे यूँ बोली
"क्या करना है आज
जरा ये सोच लो"
"जीना या मरना है ये तय इसी से होगा
आज का अभी का जाने न दो मौका "
च्यों च्यों कर बोली
"आज का काम तुम को
आज ही निपटाना होगा"
"अगर मगर कल देखोगी
तो बाद में पछताना होगा"
कहते कहते उड़ी झट से वो फुर्र...
तभी एक थोड़ा मोटा चिड़ा आकर उसी जगह पर बैठ गया
था कुछ ऐठन में
च्यों च्यों करता
चिड़ी जैसा
बोला
'क्या बतला के गयी है,
कमबख्त क्या समझा के गयी है'
सुनकर लालायित हो
कुछ कहने को
अपने मन में
चिड़े से मै तन बोली
'भला, आज का काम
आज ही कर लेना
इसे कहने में भी क्या कोई भलाई है
ये तो आम बात है,
इसमें क्या बढाई है
लगा कुछ, जैसे वो हंसा
फिर च्यों कर के
उड़ गया फुर्र....
बेठे बेठे मै सोच रही थी
फिर सोचते विचारते
बाहर थोड़ा
थोड़ा भीतर
उतरते विचारों में
दिन आधा गया बीत गया
कुछ सोचा
मन का घोड़ा
दौड़ाया
क्या क्या करना है कुछ समझ ना आया
बातें चलती थी उमड़ घुमड़कर
बस क्या बोली थी ? क्यूँ बोली थी?
अब बंद कर! इसमें इतना भी क्या बढ़ाई थी जो सीख मुझे देने आयी थी!
दिन ढलने को था
सूरज भी उबासी भरे अंदाज में चलने को था
थोड़ी बातें भी
मधम हुई थी सुबह चिड़ियों वाली..
..पर बेठे पाया दोनों
चिड़ा-चिड़ी को
वही पोजीशन में सुबह वाली..
बोले..
'हाँ तो हो गया काम जो आज के आज निपटाने थे?'
मैंने कहा
हाँ..,
पर क्या किया
बताने के लिए
कुछ नहीं था पास
बस दिमागी घोड़े
ही तो दौड़ाएं थे
कि चिड़ी ने क्या खाक शिक्षा दी है. ..
दिन ढल चुकने को था
और मेरे बिताए दिन
में मैने क्या हासिल किया
ये बताने के लिये
सच में कुछ ना था..!
फुर्र फुर्र.. की दो आवाजों ने
दिल को झकझोर दिया..
कल का दिन
निकलने से पहले
आज के दिन को
शून्य बट्टे शून्य के तराजू में तौल दिया..
कमलेश रंजन
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