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राजदान

                
                                                         
                            देने जा रहे हो दान तुम,
                                                                 
                            
पर यह दान नहीं — राजदान है।
एक निशान में बसता है,
पूरे युग का आवाहन है।

तुम जिसे ताज पहनाओगे,
वही कल तुम्हारा विधान बनेगा।
तुम जिसे मौन से स्वीकारोगे,
वही कल तुम्हारा भविष्य गढ़ेगा।

यह मत समझो सरल यह कर्म,
यह तो जन का धर्म महान है।
सिंहासन वहीं टिकता सदा,
जहाँ सत्य का कर्म प्रधान है।

राजा वही — जो चिता की राख में,
जन के लिए दीप जलाए।
राजा वही — जो रण में भी,
धर्म की मर्यादा निभाए।

पर यदि बह गए तुम भीड़ में,
मोह या माया के गीत में,
तो जल उठेगा सारा राज्य,
तुम्हारी ही चिता की प्रीत में।

होश में देना यह दान,
क्योंकि यह केवल मतदान नहीं।
यह इतिहास की गवाही है —
कि जनता अब भगवान नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 महीने पहले

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