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मैं पुरुष हूँ

                
                                                         
                            मैं पुरुष हूँ, मेरी व्यथा ही क्या
                                                                 
                            
ना दुःख कोई, ना होती पीड़ा l
मैं जब भी रोया चुपके रोया ,
दर्द को सदा सीने में छुपाया है l
गर देखे भी हैं किसी ने आँसू मेरे
पोछा नहीं है किसी ने उनको ,
ना ही ढांढस देकर चुप कराया है l
पुरुष होकर तुम रोते हो,
स्त्री के जैसे क्यों बहा रहे आँसू
क्या कायर हो, कमज़ोर हो तुम l
ये कहकर मुझे धिक्कारा है l
इस धिक्कार से ही समझा हूं मैं l
सम्भला हूं और डरा हूँ मैं l
ये ही रोने नहीं देती मुझको ,
इसने ही पोंछे हैं आँसू मेरे
इसने ही मुझे चुप कराया है l
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9 महीने पहले

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