मैं पुरुष हूँ, मेरी व्यथा ही क्या
ना दुःख कोई, ना होती पीड़ा l
मैं जब भी रोया चुपके रोया ,
दर्द को सदा सीने में छुपाया है l
गर देखे भी हैं किसी ने आँसू मेरे
पोछा नहीं है किसी ने उनको ,
ना ही ढांढस देकर चुप कराया है l
पुरुष होकर तुम रोते हो,
स्त्री के जैसे क्यों बहा रहे आँसू
क्या कायर हो, कमज़ोर हो तुम l
ये कहकर मुझे धिक्कारा है l
इस धिक्कार से ही समझा हूं मैं l
सम्भला हूं और डरा हूँ मैं l
ये ही रोने नहीं देती मुझको ,
इसने ही पोंछे हैं आँसू मेरे
इसने ही मुझे चुप कराया है l
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X