मेरा देह कबाड़घर का सराय बन चुका है
चाहे कुछ भी हो कोई भी हो
हर किसी के आगमन पर
सोचता हूँ
सोच को पकड़कर
फिर छोड़ता हूँ
मज़बूर होता हूँ
बेकार की वस्तुएँ आती है
फिर चली जाती है
सब कबाड़ है शायद
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर
मन, बुद्धि और अहंकार निकल नहीं पाते हैं
क्रिया और प्रतिक्रिया से बढ़ते जाते हैं
पर कबाड़ का हिसाब भी ज़रुरी है
वर्ना जीने के लिए जि़न्दगी अधूरी हैं
शून्यता की लालच में भाग नहीं सकता
हिसाब चुकता करने से पहले
अखण्ड अस्तित्त्व में जाग नहीं सकता।
- कामिनी मोहन पाण्डेय
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