आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कबाड़घर

                
                                                         
                            मेरा देह कबाड़घर का सराय बन चुका है
                                                                 
                            
चाहे कुछ भी हो कोई भी हो
हर किसी के आगमन पर
सोचता हूँ
सोच को पकड़कर
फिर छोड़ता हूँ
मज़बूर होता हूँ
बेकार की वस्तुएँ आती है
फिर चली जाती है
सब कबाड़ है शायद
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर
मन, बुद्धि और अहंकार निकल नहीं पाते हैं
क्रिया और प्रतिक्रिया से बढ़ते जाते हैं

पर कबाड़ का हिसाब भी ज़रुरी है
वर्ना जीने के लिए जि़न्दगी अधूरी हैं
शून्यता की लालच में भाग नहीं सकता
हिसाब चुकता करने से पहले
अखण्ड अस्तित्त्व में जाग नहीं सकता।
- कामिनी मोहन पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
14 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर