जब लुट गया खज़ाना,
तो कड़ा पहरा क्यों है?
जब दीवारें ही नहीं रहीं,
तो चौखट पर पर्दा क्यों है?
सच सरेआम बिक रहा,
तो झूठ पर पर्दा क्यों है?
जब दोषी ही रखवाले हैं,
तो न्याय का दावा क्यों है?
सवाल आज भी ज़िंदा हैं,
जवाब कहीं गुमनाम क्यों हैं?
जो लूटते रहे बस्ती को,
वही आज पहरेदार क्यों हैं?
— कमल किशोर झा
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