मन की असीम गहराइयों में,
जैसे कोई खजाना मिल गया,
भटक रहा था जिसे ढूंढने को,
आज वह अफ़साना मिल गया।
कुछ बिसरे ख़्वाब मिले,
जो बीते पल मुस्काए थे,
यादों की बंद किताबों में,
कितने मोती छिपे पाए थे।
जिसे ढूँढ़ता रहा बाहर मैं,
वह तो बैठा मेरे भीतर था,
जिसको दुनिया में खोजा,
वह मेरे मन के अंदर था।
मन की असीम गहराइयों में,
जैसे कोई खजाना मिल गया,
खुद से जब मेरी मुलाकात हुई,
जीने का फिर बहाना मिल गया।
— कमल किशोर झा
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