मुकद्दर को सिकंदर जैसी जमानत न थी,
जमाने को हवाओं जैसी ताबिंदगी न थी।
हर मोड़ पर वक़्त ने नए तमाशे दिखाए,
पर इंसानी ख्वाबों की कोई बंदिश न थी।
जिसे समझा था मुसाफिरों ने अपना रहनुमा,
उस चिराग में भी जलने की कोई कशिश न थी।
समंदर की लहरों ने रेत पर लिखे थे जो नाम,
उन्हें मिटाने में साहिल को कोई झिझक न थी।
सब हाथ मलते रह गए इस मुसाफिरखाने में,
यहाँ ठहरने की किसी को भी इजाजत न थी।
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