वो एक काग़ज़ का टुकड़ा समझकर हमें हवाओं में उड़ा रहे थे,
हमारी कश्ती को लहरों की बेबसी समझ किनारों से मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने समझा था कि ख़ामोशी हमारी हमारी कमज़ोरी है,
वो अपनी नासमझी में एक सोते हुए शेर को जगा रहे थे।
जब सुनी उन्होंने हमारी सिसकियाँ और संघर्षों की दास्तान,
तो जो कल तक ज़ख्म दे रहे थे, आज वो खुद आँसू बहा रहे थे।
हम वो समंदर हैं जिसकी गहराई का कोई अंत नहीं,
वो नादान महज़ सतह का पानी देखकर अपनी औकात बता रहे थे।
अब जो पलट चुके हैं पन्ने हमारी ज़िंदगी की किताब के,
वो हमारी कामयाबी के हर एक हर्फ़ को रो-रोकर दहशत में पढ़ पा रहे थे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X