रूठी हुई आरजू आँखों से बह रही थी,
ये कतरा-कतरा रब से कुछ कह रही थी।
और ये छटा कुछ महसूस कर रही थी,
ख्वाबों में मन को कुछ समझा रही थी।
खामोश फिज़ा भी दर्द मेरा भाँप रही थी,
शायद दुआ मेरी फलक को नाप रही थी।
रूठी हुई वो मुस्कान मन को भर रही थी,
एक आस की किरन रूह में उतर रही थी,
देखते-देखते ये संध्या मगन कर रही थी
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