ये सौदा कैसा है बाबा
मैं कल तक तो तुम्हारी बेटी थी
तुम कहते अपने घर जाओ
मैं कल तक तो यही पे रहती थी
मेरी शिक्षा दाव पर लगी
तब जा कर भरी दहेज की पेटी थी
माना मैं इस घर का चिराग नहीं
पर हर आरती तो मेरे हाथों होती थी
तुम बोले थे ना बाबा मुझको
मैं बिल्कुल वैसे ही तो रहती थी
पराया कर दिया इतना तुमने
मैं खुदको पापा की परी कभी कहती थी
वो गैर है उनसे उम्मीद क्या हो
तुमसे तो कुछ उम्मीद रहती थी
उन पढे लिखो की अदा भी बड़ी निराली थी
जितना दर्जा ऊंचा, उतनी फितरत ढीली ढाली थी।
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