मुझे अज़ीज़ है वो खत तेरा
जो छुपा रखा है मैंने एक किताब में
महकने लगे हैं हर पन्ने हर अल्फाज़
वो किताब डूबी है बस तेरे एहसास में
यूं वो खोला जो मैंने खत तेरा
मेरी सांसें, आहों में तबदील हुई
वो पढ़ा पहला हर्फ़ ही था मैंने
कि रुख़सार हया से गुलाबी हुए
तेरी यादों का सिलसिला जो बना
ज़लज़ला सा तन बदन में उठा
जो रूठे थे तुम से अब
मोहब्बत दिल में गुदगुदाती है
हर अल्फाज़ दिल की रफ्तार बढ़ाता है
लगता है तू यहीं- कहीं से मुझको बुलाता है
तेरे हर जज़्बात इस खत में नज़र आते हैं
क्या कलम में दिल की स्याही लगाते हैं
आप लिखते हैं अपने जज़्बात खूब
यूं हमको जज़्बाती बनाते हैं
यूं लिख- लिख के तुम खत कई
जो हमसे नज़रों को चुराते हो
बेचैन अल्फाज़ों से, मेरे आँखों में बस जाते हो
मुझे अज़ीज़ है वो खत तेरा...
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