कोई इश्क़ के मारे,
तो कोई दूजे के सहारे,
आखिर कैसे कोई ज़िन्दगी गुज़ारे...
कभी पलों में ज़िन्दगी मिल जाती है
तो कभी ज़िन्दगी में एक पल नहीं मिलता
कभी नदियां भी मीठी धारा है
सागर सब अपना कर भी खारा है
कोई जीने का बहाना है
तो कोई मरने की चाहत है
ये दुनिया मुकम्मल होती है जहां
वही शुरुवात का भी ठिकाना है
कहीं बेपनाह प्यार है
तो कोई तन्हाई का बाज़ार है
किसी की कब्र भी आलीशान है
तो कोई बेघर सा है
कोई सपनो को सजाये
तो कोई टूटे ख्वाबो का बोझ उठाए
आखिर कैसे कोई ये पहेली सुलझाए ....
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X