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आखिर कैसे कोई ज़िन्दगी गुज़ारे

                
                                                         
                            कोई इश्क़ के मारे,
                                                                 
                            
तो कोई दूजे के सहारे,
आखिर कैसे कोई ज़िन्दगी गुज़ारे...

कभी पलों में ज़िन्दगी मिल जाती है
तो कभी ज़िन्दगी में एक पल नहीं मिलता

कभी नदियां भी मीठी धारा है
सागर सब अपना कर भी खारा है

कोई जीने का बहाना है
तो कोई मरने की चाहत है

ये दुनिया मुकम्मल होती है जहां
वही शुरुवात का भी ठिकाना है

कहीं बेपनाह प्यार है
तो कोई तन्हाई का बाज़ार है

किसी की कब्र भी आलीशान है
तो कोई बेघर सा है

कोई सपनो को सजाये
तो कोई टूटे ख्वाबो का बोझ उठाए
आखिर कैसे कोई ये पहेली सुलझाए ....


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7 वर्ष पहले

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