सुना है, फिर से धरना होगा,
बच्चे एक बार फिर मैदान में उतरेंगे…
मन में बस एक ही प्रार्थना है ईश्वर से—
हर बच्चा सुरक्षित रहे, हर कदम महफ़ूज़ रहे।
काश! एक दिन ऐसा भी आए,
जब यही बच्चे बड़े होकर,
उच्च पदों पर आसीन हों,
और ऐसी व्यवस्थाओं का निर्माण करें
जहाँ न्याय के लिए आवाज़ न उठानी पड़े,
अधिकारों के लिए सड़कों पर न आना पड़े,
और सच को साबित करने के लिए संघर्ष न करना पड़े।
जहाँ व्यवस्था ईमानदारी की पहचान बने,
जहाँ पद सेवा का पर्याय बने,
जहाँ भ्रष्टाचार का अंधकार मिटे,
और हर नागरिक का विश्वास फिर से जगे।
ईश्वर से बस इतनी-सी विनती है—
आज जो बच्चे अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं,
कल वे ऐसा भविष्य गढ़ें
जहाँ किसी बच्चे को अपने सपनों के लिए धरने पर न बैठना पड़े।
उनके संघर्ष को सार्थकता मिले,
उनके सपनों को उड़ान मिले,
और आने वाली पीढ़ियों को
एक ऐसा संसार मिले
जहाँ विरोध नहीं, समाधान हो;
संघर्ष नहीं, सम्मान हो;
और व्यवस्था में भ्रष्टाचार नहीं,
केवल सत्य, न्याय और ईमान हो।
हे ईश्वर! बच्चों की रक्षा करना,
उनके साहस को सही दिशा देना,
और उन्हें इतनी शक्ति व विवेक देना
कि वे केवल अपना भविष्य ही नहीं,
बल्कि पूरे समाज का भविष्य सँवार सकें।
यही प्रार्थना है… यही विश्वास है…
कि एक दिन धरनों की आवश्यकता नहीं,
बल्कि सुशासन की मिसाल होगी।
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