माटी के पुतले
कहीं तोड़े गए
कहीं पूजे गए,
जीवन के मेले में
न जाने कितने रंग
आ के चले गए!
कभी मान मिला
कभी ठोकर मिली,
अपने भाग्य की रेखाओं में
बहुत कुछ छूट गया!
माटी की देह लेकर
सब आये हैं यहां,
न कोई सदा राजा
न कोई सदा फकीर यहां!
जो कल शिखर था
वो आज धूल यहां,
समय के हाथों से
सब बदल जाता यहां।
फिर अभिमान किस बात का
सब क्षणभंगुर यहां,
क्यों बांटें किसी को आकार से
प्रेम से जी लें
प्रेम ही देकर जाएं यहां!
बस यही अर्थ है
बस यही तर्क है
इस माटी के अवतार का!
माटी के पुतले...
ज्योति वर्मा
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