यहां धुआं, वहां धुआं,
यहां आग, वहां आग,
यहां चिता, वहां चिता,
सरहद पे युद्ध का बिगुल बजा
ब्लैकआउट, ड्रोन हमले का जाल बिछा
यहां चिंता, वहां चिंता
आगे क्या होगा किसने देखा पहलगाम के आतंकी हमले में
इंसानियत का घुटा गला
दहशत और आतंक मिटाने
आपरेशन सिंदूर का उदय हुआ
अब बचा है बस एक ही रास्ता
इंसान बनो, वतन को संभालो
मानवता का उद्धार करो
कहीं कराहती माटी है,
कहीं मां की गोद वीरान है,
पाक पड़ोस में बचपन रोता अनाथ भूख से बेहाल है
क्या यही विकास, यही तरक्की है
जो हथियारों पे नाज करे
प्रेम के भोले भाव भुलाए
रिश्तों का व्यापार करे
क्या यही सभ्य समाज है
जहां इंसानों का रक्त बहे
हथियार, बम का मान बढ़े
टूटे घर, जलते गांव,
गली-गली में दहशत पसरी
फटी चिथी इंसानियत रोती
क्या यही इंसानों की पहचान है
इंसान बनो, वतन संभालो
मानवता का उद्धार करो
भारत की धरती से पुकार उठे,
तमसो मा ज्योतिर्गमय
हमने बुद्ध को जना, गांधी को जिया,
अहिंसा से हर युद्ध को हराया
नफरत की दीवारें ढहाओ
तिरंगे के नीचे एक बात कहो
ना लड़ेंगे, ना लड़ने देंगे,
गर छेड़ेगा कोई, तो तोड़ देंगे
शांति का दीप हर दिल में जलाएंगे।
इंसान बनो, वतन को संभालो,
मानवता का उद्धार करो
फिर रचो नयी दुनिया की कहानी,
जहां न हो कोई सरहद, न बर्बर रवानी।
भारत बने वो दीप जो अंधेरे में जले,
मानवता की राह पे फिर उम्मीद पले।
इंसान बनो, वतन को संभालो
मानवता का उद्धार करो
-ज्योति वर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X