तुलना जीवन की करी जो दिन से
परख जो पाया वो कहें मेरा मन
किरण भोर की जैसे बचपन
जो लगे एक सुकूं भरा क्षण
मंद हवा की शीतल लहरे
जैसे एक पैगाम सुनाती है
ठीक उसी तरह से ही तो
बचपन की तुतलाती भाषा
छाती शीतल कर जाती है
वक़्त दोपहर का आता है
और धूप कड़ी जब होती है
ये वक़्त जवानी का होता है
जिसमें मुश्किलें बड़ी होती है
मेहनत जो इस वक़्त है करते
एक सुकून शाम को वो पाते हैं
ये वक़्त बुढ़ापे का होता है जब
दिन भर की दौड़ से थक जाते हैं
शाम के बाद फिर रात है आती और
वो जीवन को अलविदा कह जाते हैं.....
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