तुम कलियों की खुश्बू
फूलों में गुलाब हो,
जिसे बार-बार जी पढ़ना चाहे
वह प्रेम की किताब हो।
राहों में मंजिल हो तुम
सपनों में इक ख्वाब हो,
जिसे पीकर मन तृप्त हो जाए
वह मधुशाला शबाब हो।
तुम सपनों की शहजादी हो
मैं तो बस रखवाला हूँ,
जब याद तुम्हारी आए तो
पी लेता मधु का इक प्याला हूँ।
तुम गुलशन की इक क्यारी हो
मैं उड़ता भौरा माली हूँ,
तुम प्रेम सुधा बरसाने की
मैं बस उसका इक डाली हूँ।
तुम जन्नत की इक हूर परी
मैं उड़ता फिरता तारा हूँ,
तुम खुशियों की इक हीर अफ़सरा
मैं गम से मारा मारा हूँ।
जीवन का इक रंग अनोखा
भरकर तेरी ज्योति जला दूँ,
खुशियों का मैं जुगनू बनकर
अंधरों में भी साज सजा दूँ।
दिल करता बस लिखता जाऊँ
गुल के पुष्प खिलाता जाऊँ,
सच में तुम जो हो मनमोहन
बस प्रेम के गीत ही गाता जाऊँ,
बस प्रेम के गीत ही गाता जाऊँ।
- दुर्गेश बहादुर प्रजापति
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