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कल, आज और कल

                
                                                         
                            यह तब की बात है,
                                                                 
                            
जब दादी के पास समय ही समय था
और थे ढेर सारे किस्से
शाम होते ही दादी के आगे-पीछे
डोलने लगते थे हम सभी भाई बहन
दादी के किस्सों मे परियां थीं
जादूगर था, धनुष उठाए राम थे
रासलीला रचाते कृष्ण थे
नून-रोटी खाकर भी
हमारे चेहरे पर बची थी हंसी
और गांव मे बहती थी एक नदी
जिसका नाम था खुशी

लोग नदी में नहाकर,
गुड़ रोटी खाकर
खेतों में हल चलाकर
रहते थे तंदरुस्त
बच्चे खेलते थे गिल्ली-डंडा, छुपनछुपाई
तो किशोर खेलते थे कबड्डी, खो-खो
और करते थे कुश्ती

लोग पैदल, साइकल से कर लेते थे
मीलों का सफर
लोगों के पास संसाधन थे तो कम
पर रहते थे खुश, संतुष्ट

आज कुछ बदल-सी गई है दुनिया
लोगों के पास समय ही नहीं
न अपनों के लिए न औरों के लिए
यहां तक कि खुद के लिए भी नहीं
भाग-दौड़ में कट रही है जिंदगी
डिजिटल युग में सब हो गए हैं डिजिटल
हो गए हैं स्वार्थी
जिंदगी सीमट गई है मोबाइल, लैपटॉप तक

शहर हो गए हैं गुमनाम
किसी से नहीं कोई वास्ता,
बगल में कौन रहता है नहीं पता
कहने को तो सदी है इक्कीसवीं
आधुनिकता का है दौर
हम हो रहे हैं विकसित
हवा में बना रहे हैं घर
पर वास्तविकता यह है कि
हम खुद से भी होते जा रहे हैं दूर
अपने भी होते जा रहे हैं पराये
खोते जा रहे हैं अपनी संस्कृति धरोहर

यह ऋषि-मुनियों, महापुरुषों, देवों की भूमि है
यहां की मिट्टी अपने-आप में है पूज्यनीय
यह गौरव है हमारा...
हमारी संस्कृति अपना रहे हैं विदेशी
और हम विमुख होते जा रहे हैं उनकी ओर
ऐसा न हो कि हम हो जाएं विदेशी
और वे हो जाएं देसी...

हालांकि गांवों में अभी भी जिंदा है वह आबो हवा
छप्परों, खपरैलों से अभी भी आती है सौंधी सुगंध
पूरा गांव परिवार की तरह रहता है मिलजुल कर
एक-दूसरे के दुख-दर्द में रहता है साथ
अपनी रोटी खाता है मिल-बांटकर...
पर फिर विकास की रफ्तार
गांवों में भी तो दे रही है दस्तक,
गांव शहर में हो रहे हैं तब्दील...
उजड़ रहे हैं कच्चे मिट्टी के घर,
उनकी जगह ले रहे हैं चमचमाते मकान...
शहरों की ओर लोग कर रहे हैं पलायन
टूट रहे हैं घर, बिछड़ रहे हैं परिवार

तारों, लाइटों के जंजाल ढंक रहे हैं आसमान
संचार टॉवर पक्षियों का छीन रहे हैं बसेरा
आकाशवासी अब हो रहे हैं परलोकवासी,
अंततः जिनका असर होना है मानव जीवन पर ही...
संकट के बादल हैं ये मानव अस्तित्व पर

आने वाली पीढ़ी को ये क्या दे रहे हैं हम
क्या छोड़ कर जाने वाले हैं हम
चिंतन करें अपने अंतस्थल में
सजग हों, लाएं जीवन में परिवर्तन
अपनाएं सादा जीवन उच्च विचार
ताकि आगामी भविष्य हो सुनहरा
हों ऐसे समुचित विकास, कि
प्रकृति भी रहे साथ
पारंपरिक विरासत भी रहे हाथ
ताकि आने वाली पीढ़ी करे नाज...
- दुर्गेश बहादुर प्रजापति
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2 वर्ष पहले

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