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हाँ देश का वही एक किसान हूँ मैं

                
                                                         
                            हाँ वही अन्नदाता वही किसान हूँ मैं...
                                                                 
                            

सदियों से देश को पालता, लोगों की भूख मिटाता हूँ मैं।
औरों के लिए अपना खून-पसीना बहाके अनाज उगाता हूँ मैं।
हाँ वही अन्नदाता हूँ मैं..हाँ वही अन्न दाता हूँ मैं।

देश का पेट भरने के लिए खुद सूखी रोटी खाता हूं मैं,
हम सबसे ही देश है और इस देश के लिए खुद को तपाता हूं मैं।
हाँ वही अन्नदाता हूँ मैं..हाँ वही अन्नदाता हूँ मैं..

मुझसे ही देश कृषि प्रधान और असल में देश की रीढ़ हूँ मैं,
सर्वाधिक आबादी में और देश को जीवन दाता हूँ मैं।
हाँ वही अन्नदाता हूँ मैं..-2

लोगों की भूख मिटाने के लिए खुद कंधे पर हल लेकर चलता हूँ,
सुना देश विकास कर रहा पर मेरी ही समस्या का हल क्यूं नहीं निकलता है।

कभी बेरोजगारी कभी मंहगाई कभी भ्रष्टाचार का शिकार होता हूँ मैं,
कभी अन्याय कभी राजनीति कभी दुराचार का शिकार होता हूँ मैं..
यहां तक कि..
आज अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हूँ मैं,
अपने अस्तित्व के लिए कड़ाके की ठंड में आंदोलन करने को मजबूर हूँ मैं..

आखिर ये कैसा देश है कैसा लोकतंत्र है ...
जहां अपने घर में ही अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ना पड़ता है.
जहां अपना घर परिवार छोड़ कर इस देश के खातिर सब कुछ सहना पड़ता है.

जहां गर अपने हक लिए आवाज उठाता हूँ तो आतंकवादी कहलाता हूँ मैं ..
जहां गर अपनी अस्मिता के लिए सड़कों पर उतरता हूँ तो जान गंवाता हूँ मैं...
हाँ वही अन्नदाता हूँ मैं...-2

अपने पुरखों अपने वंशो का अरमान हूँ मैं..
आने वाली नश्लों का वरदान हूँ मैं..
सदियों से ही देश की पहचान हूं मैं ....
हाँ वही देश का एक किसान हूँ मैं...
हाँ वही देश का एक किसान हूँ मैं...

जिसने भगत सिंह आजाद जैसे वीरों को पाला,
जिसने देश की आजादी में सबकुछ न्योछावर कर डाला।
हाँ बंजर धरती से अन्न उगाकर देश की सेवा करता एक जवान हूँ मैं...
हाँ वही देश का एक किसान हूँ मैं...

बस एक प्रश्न...

ऐसे कितने नेता हैं जिनके बेटे सीमा पर देश की रक्षा करते हैं,
ऐसे कितने नेता हैं जिनके बेटे देश के खातिर जान गंवाते हैं...

जितने भी वीर सीमा पर हैं...किसान के ही बेटे हैं।
हर तरह से हम देश को ही समर्पित हैं..

फिर भी क्यों हमें नजर अंदाज किया जाता रहा है...
हर तरह से क्यों हमें दबाया जाता रहा है..
हर तरह से आखिर क्यों हमें सताया जाता रहा है..
इस तरह से आखिर क्यों हमें रुलाया जाता रहा है ...

अरे मैं भी देश का एक नागरिक, एक इंसान हूँ मैं

हाँ वही अन्नदाता वही देश का एक किसान हूँ मैं...-2

हाँ वही देश का एक किसान हूँ मैं...

रचनाकार- दुर्गेश बहादुर प्रजापति
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

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