बहारें लौटकर आएंगी ये एक झूठा वादा था
दिल-ए-मासूम ने पतझड़ को बस दो दिन का समझा था
शुमार-ए-बज़्म है पूरी तरह इस बात से वाक़िफ़
बुरा बनने से पहले मैं बहुत ज़्यादा ही अच्छा था
मेरी आँखों ने जब देखा वो मंज़र बे-वफ़ाई का
ज़ुबाँ ख़ामोश थी मेरी मैं इन आँखों से चीख़ा था
चुभा कुछ पैर के तलवे में उसका ख़ून भी निकला
कोई काँटा नहींं वो मेरे दिल का टूटा टुकड़ा था
तलाश-ए-ज़ात में मशग़ूल था बे-इंतेहा लेकिन
मैं पूरी उम्र ख़ुदकों ढूंढकर नाक़ाम लौटा था
-जॉनी अहमद ''क़ैस"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X