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काश कोई गुमनाम सा

                
                                                         
                            काश कोई गुमनाम सा मुझसे भी आकर मिले
                                                                 
                            
काश किसी की यादों से मन मे एक फूल खिले जब कदम बढ़े, संग चलने को तो में क्यूँ घबरा जाती
हूँ ? जब होंठ खुले कुछ कहने को तो मैं चुप सी हो जाती हूं
क्या सुननी वाले लब्ज़ो को मेरी खामोशी सुन पाएंगे?
क्या संग में चलने वाले मेरे मन को भी अपनाएंगे?




 
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3 घंटे पहले

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