अवधपुरी अति-धाम सुहाना| दशरथ-राज सकल जग जाना||
पुत्र हेतु पुत्रेष्टि कराया| नृप ने चार पुत्र को पाया||
धन्य-धन्य कौशल्या माई| अवधपुरी जन्मे रघुराई||
अवधपुरी उल्लास मनावे| देवलोक भारी हर्षावे||
अवधपुरी दुर्वासा आऐ| सबके भूत-भविष्य सुनाऐ||
गुरु वशिष्ठ से शिक्षा पाई| बड़े हुऐ अब चारों भाई||
ॠषि-मुनि निशाचरों से हारे| व्याकुल विश्वामित्र पधारे||
विश्वामित्र मुनीश्वर ज्ञानी| रघुनन्दन की महिमा जानी||
लेकर राम-लखन दो भाई| तपोभूमि भयमुक्त कराई||
सन्तों से आशीष दिलाया| देवलोक भारी हर्षाया||
वन में विकट ताड़का मारी| सारी असुर शक्ति संघारी||
पत्थर बनी अहिल्या नारी| गौतम की चरणों से तारी||
जनक राज ने शर्त लगाई| मिथिला पहुँचे दोनों भाई||
शिव का एक धनुष था भारी| विफल हुऐ सारे बलधारी||
रघुवर ने जब धनुष उठाया| सारा भू-मण्डल थर्राया||
परशुराम क्रोधित हो आऐ| दोनों राम-लखन हड़काऐ||
जब जाने रघुवर अवतारी| गुस्सा भंग हुआ सब भारी||
जनक राज उठकर तब आऐ| विधिवत विश्वामित्र मनाऐ||
जनक-सुता रघुवर ने पाई| संग में व्याहे चारों भाई||
राज-तिलक की थी तैयारी| अवधपुरी आनन्दित भारी||
कैकई ने अपने वर माँगे| राजा भरत राम वन त्यागे||
रानी ने ऐसी जिद ठानी| जिद के आगे एक न मानी||
हुऐ भूप सुन व्याकुल भारी| इस जैसी ना देखी नारी||
सुनकर लखन महल में आया| रघुवर ने उसको समझाया||
बोला संग चलूँगा वन को| कैसे मना करें लक्ष्मण को||
सुन सीता महलों में आईं| बोलीं बनकर मैं परछाईं||
मैं भी साथ चलूँगी वन को| तो ही चैन मिलेगा मन को||
अवधपुरी में चर्चा भारी| सुनकर दुखी हुऐ नर-नारी||
देखो तुम विधना की माया| राज-तिलक संकट में आया||
वचनवद्ध रघुवर वन आऐ| चित्रकूट में आश्रय पाऐ||
राजा दशरथ स्वर्ग सिधारे| भारी व्याकुल भरत बिचारे||
सारा अवधपुरी वन आया| रघुनन्दन को खूब मनाया||
चरण-पादुका हाथ थमाई| लेकर चला भरत सा भाई||
पंचवटी रघुनन्दन आऐ| रघुकुल के सब वचन निभाऐ||
सुन्दर शोभा सूर्योदय की| लेकर आस वर्ष चौदह की||
शूपर्णखा रावण की भगिनी| कुटिल निश्चरी पापी ठगिनी||
रघुवर को प्रस्ताव सुनाया| लक्ष्मण को ये रास न आया||
सीता को खाने को झपटी| लक्ष्मण ने कर दी तब नकटी||
खर-दूषण की सेना मारी| शूपर्णखा अति-व्याकुल भारी||
रावण को सब कथा सुनाई| पंचवटी ठहरे दो भाई||
मृग मारीच निशाचर माया| बनकर स्वर्ण हिरण तब आया||
सीता ने ऐसी जिद ठानी| रघुनन्दन की एक न मानी||
माया ने माया बहकाई| आगे मृग-पीछे रघुराई||
राम-बाण से सदगति पाई| लक्ष्मण कह आवाज लगाई||
लक्ष्मण धनुष-बाण ले भागा| रावण ने अपना रुख त्यागा||
साधू बन आवाज लगाई| कुछ तो दान-पुण्य दो माई||
दान-पुण्य का जज्बा जागा| सीता ने रेखा को त्यागा||
सफल हुई विधना की माया| सम्मुख दुष्ट दसानन पाया||
कपटी रूप साधु का त्यागा| सीता को लंका ले भागा||
वन में सूनी कुटिया पाई| चिंतित राम-लखन दो भाई||
पक्षी ने सब कथा सुनाई| पम्पापुर पहुँचे रघुराई||
शबरी के झूठे फल खाऐ| ऋष्यमूक पर्वत पर आऐ||
बनकर विप्र पवन-सुत आऐ| रघुवर से सुग्रीव मिलाऐ||
सन्धि हुई सुग्रीव वीर से| बाली को वध दिया तीर से||
वानर की सब सेना आई| चले ढूँढने सीता माई||
पवन-पुत्र ने आज्ञा माँगी| सौ योजन की दूरी लाँघी||
अंजनि-सुत लंका में आऐ| सीता को संवाद सुनाऐ||
लंका में उत्पात मचाया| सोने का सब नगर जलाया||
सिन्धु तीर कपिसेना आई| कैसे पार करें कपि भाई||
सागर पर जब सेतु बनाया| देवलोक भारी हर्षाया||
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