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ब्राहमण अभिनन्दन

                
                                                         
                            "ब्राहमण अभिनन्दन"
                                                                 
                            

हे विप्र सुनाे अब ऐसे हम, खुद काे भी कुछ याद करें।
बेदर्द जहां पर हाे आगे, तब क्यूं फिजूल फरियाद करें।।

हे विप्र उठाे अंगड़ाई लाे, चाणक्य शरी बनकर आओ।
तुम ज्ञान ध्यान विज्ञान पढ़ो, दुनियां पर फिर से छा जाओ।।

हमकाे उंगली सा बता रहा, विस्तृत पट वह भ्रगुनंदन है।
जाे क्रान्ति दूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

जब से ब्राह्मण को ब्राह्मण का, सम्बल मिलना शुरु हुआ।
वसुधा से उठकर ब्राह्मण ने, हाथों से आकाश छुआ।।

पग-बाधा बनकर ब्राह्मण ने, ब्राह्मण को ही अक्सर रोका।
ब्राह्मण ने इतिहास रचाया, जब भी उसे मिला मौका।।

ब्राह्मण लाेगाें में खुद हमने, देखा ये अजब प्रबन्धन है।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

जिसने धर्म अधर्माें का भी, भेद हमें बतलाया है।
जीवन की शुचिता का जिसने, सहज मार्ग समझाया है।।

जिनसे ज्ञान सुधारस पाकर, हम पुलकित हाे जाते है।
ऐसे ब्राह्मण के चरणाें में, नित नित शीश झुकाते है।।

ब्राह्मण की क्रपा मात्र से ही, कटता भव का हर फन्दन है।।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

वाे दीन सुदामा नाम विप्र का, मित्र द्वारिकाधीश बना।
दुनियां का महाबली-ज्ञानी, राजा बनकर दसशीश बना।।

था वीर जवाहर लाल विप्र, भारत का प्रथम प्रधान बना।
आजाद चन्द्रशेखर जैसा, मर कर भी अमर महान बना।।

इस आजादी के महासमर का, स्वर्ण अझर में वर्णन है।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

जिनके हाथाें में बल हाेता, दुनियां काे वही चलाते है।
दुनियां में वे ही पूज्यते है, उनके नगमे ही गाते है।।

जागाे ब्राह्मण जागाे जागाे, अपने वर्णाेत्तम काे जानाे।
वे मर्जी काम में मत भटकाे, तुम वर्तमान काे पहचानाे।।

खतरे में दिखता तिलक आज, खतरे में दिखता चन्दन है।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

चाेटी भी खतरे में दिखती, धाेती भी अब खतरे में है।
हे ब्रह्म देव रक्षा करना, जब ब्रह्म वंश खतरे में है।।

चर्चाें से चिठ्ठी निकल पड़ी, मस्जिद का फतवा बाेल रहा।
अब मन्दिर गर खामाेश रहे, समझाे कि खतरा डाेल रहा।।

हमें नजर ना लगे किसी की, परशुराम का वन्दन है।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

ब्राह्मण के दो आगे ब्राह्मण, ब्राह्मण के दो पीछे ब्राह्मण।
बढ ना जाये अगला ब्राह्मण, खींच रहा है पिछला ब्राह्मण।।

बाहर खूब दिखावा करते, बढ ना पाये तीनों ब्राह्मण।
जहां खड़ा था पहले ब्राह्मण, वहीं खड़ा हैं अब भी ब्राह्मण।।

खुद ब्राह्मण हाेकर ब्राह्मण का, करते दिल से अभिनन्दन है।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

जजमानी के दिन बीत गये, जजमानाें ने कस ली अन्टी।
अपनी संस्क्रति पर, निष्ठा पर, खतरे की आज बजी घण्टी।।

ब्राह्मण के अस्तित्व तलक पर, घाेर घटा मंडराई है।
अब तिलक, जनेऊ, चाेटी और मर्यादा पर बन आई है।।

ब्राह्मण के घर में आज विकट, राेजी राेटी का क्रन्दन है।
जाे क्रान्तिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनन्दन है।।

- जितेन्द्र त्रिपाठी 'हेमू'

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6 वर्ष पहले

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