उस मां की ममता भूल गये?
जो मलद्वार तुम्हारा धोयी थी।
तुझे चोट खरोच आ जाने पर,
ओ फफक फफककर रोयी थी।
तुझे साथ मे लेकर सोती थी,
तुम बिस्तर गीलाकर रोते थे।
तुझे उठा सीने से लगाकर ,
ओ खुद गीले में सोयी थी।।
तुझे चूम सीने से लगाकर,
कितने ख्वाब सजोई थी।।
ओ प्यार लुटाती थी तुझपर
पर तूने अच्छा सिला दिया,
जो रोने पर शांत कराती थी।
तूने उसको ही रुला दिया।।
दौलत शोहरत कितनी भी हो,
बिन मां के सदा अधूरा है।
जीवन देने वाली के बिन,
कैसे जीवन तेरा पूरा है।
जुल्म करो मिल बीबी संग,
बच्चे तेरे सब देख रहे हैं।
दादी कब कब कैसे रोयी,
समझ रहे सब सीख रहे हैं।।
तेरे बच्चों का दिन आएगा,
जब तेरा दुर्दिन आएगा।।
तब बच्चों को कैसे समझोगे,
जब बच्चा तुमको ठुकरायेगा।।
जितेंद्र मिश्र वाराणसी
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