जो तुम सब कहती हो
जानता हूँ सच कहती हो
सुबह से लेकर शाम तक
शाम से लेकर सुबह तक
जिसका कोई अर्थ नहीं
वो सब सहती रहती हो
जानता हूँ सब सच कहती हो
मेरी भी एक बात मान लो
मुझको भी अब तुम जान लो
दुःख सुख चलता रहता है
यह वक़्त बदलता रहता है
पर मेरे सुख और दुःख में
बस तुम संग संग रहती हो
जो तुम सब कहती हो
जानता हूँ तुम सच कहती हो
जैसे नदिया बहती रहती है
कल कल करती रहती है
दूर समंदर हो कितना भी
निरंतर चलती ही रहती है
तुम भी मेरे पीछे पीछे ही
नदिया बनकर बहती रहती हो
जो तुम सब कहती हो
मैं जानता हूं तुम सच कहती हो
जिस दिन तुम घर आई थी
थोड़ी थोड़ी शरमाई थी
मैं भी तुमसे अनजाना था
लेकिन फ़िर भी तेरा दीवाना था
अब तो घर और दीवारों से
बस बातें करती रहती हो
जो तुम सब कहती हो
जानता हूँ तुम सच कहती हो
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