मंद मंद हवा
बह रही है
धीरे से कुछ
कह रही है
शर्माती मुस्कराती
अपनी मीठी लोरी सुनाती
पेड पौधों को
गले से लगाती
सूरज की किरणों को
गोद में सुलाती
सब कुछ ये
सह रही है
मंद मंद हवा
बह रही है
धीरे से कुछ
कह रही है
कभी पूरव‐पिश्चम
कभी उत्तर‐दक्षिण
तो कभी दिशाहीन
ये हो रही है
कभी माटी में खेलती
तो कभी नदी में नहाती
कभी बालों को सहलाती
तो कभी ये इतराती
यूँ ही ये
मचल रही है
जगह जगह
ये टहल रही है
मंद मंद हवा
बह रही है
धीरे से कुछ
कह रही है
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