मुहाजिर गांव में तेरे खबर तू रख हमारी भी
यकीं गर है नहीं फिर ले नज़र तू रख हमारी भी
निहायत छांव के शौकीन हैं ये लोग तेरे तो
गुलिस्तां-ए-जहां से शज़र तू रख हमारी भी
चली है जब अभी ये रात जो बाकी बहुत भी है
अगर तेरी हुई कल शाम तो ले फिर सहर तू रख हमारी भी
चले हैं देखने को वस्ल-ए-हदे-आसमाँ हम तो
तुझे गर देखना है रहगुज़र तू रख हमारी भी
इनायत मानता हूं सब अदा-ए-यार को अब तो
कहीं दिल-ओ-जाँ में तेरी असर तू रख हमारी भी
हमेशा धड़कनें दिल की बढ़ाती हो घटाती हो
ख़यालों में कभी जिक्रे क़सर तू रख हमारी भी
जरा देखें इरादा एक पर दमदार ऐसा है
बनाया है समंदर तो लहर तू रख हमारी भी
कमी है वक़्त की गर जिंदगी में अबतलक तेरी
तो ये दिन जोड़ के आठों पहर तू रख हमारी भी
जरूरत है उजाले की बहुत पर क्या करें अब हम
हुआ ये चाँद तेरा तो महर तू रख हमारी भी
कहीं तासीर-ए-वाबस्तगी देखा नहीं तो ले
सबब-ए-शर्म-ए-जाँ-ओ-जिगर तू रख हमारी भी
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