हंसते हैं लोग मेरी मुफ़लिसी पर
कौन समझाए इन्हें फिर बेबसी पर
ये ग़रीबी देख कर भी तो डंटे हैं
इक न हम आवाज़ करते बेकसी पर
इक झलक तो देख ले मेरा जरा सा
आज फिर से जा गिरा हूँ मैं उसी पर
दूसरों से क्यों गिले शिक़वे करें हम
दाग हमने ही लगाया है ख़ुशी पर
जानते हैं ये ज़हर, पर शान से ही
मर मिटे थे हम अकेले जांनशीं पर
बात समझे ना हमारी वो अभी तो
एक ही अब आसरा है मयकशी पर
जान ले तूने किया है क्या सता के
आजमाइश ही सही गर ख़ामोशी पर
आदतों को भी जवां करके चलें तब
एकदम चुपचाप हो जाना हँसी पर
मार के बेकार भूखे, पेट ने भी
जान दे दी यूं हमारी दिलबरी पर
ये इशारे हैं 'जयंत' बना लिया जो
आज़मा के बैठ जा छींटाकशी पर
-जयंत पटेल
मेरे अल्फाज़
अमलतास की बालियाँ
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वो हरीतिमा की चादर ओढ़े
एक सुबह जब अलसाकर जाग रही थी
कहीं मैं भी तो तुम्हारे बाहु पाश में कसमसा रही थी ।।
क्या याद नहीं तुम्हे ओस की बूंदों सा नम बिस्तर
तारों सी अलविदा कहती वो उलझन
और पलकें कोई चँवर डुला रही थी ।।
जब भी मिलते थे मुझे तुम
आसमां नीला सा, नहीं नहीं कुछ स्याह सा
हो जाता था
और गिर पड़ती थीं कुछ बूंदें उम्मीदों की उनसे
एक और बूंद भी आज तुम्हें बुला रही थी ।।
मेरे हाथों में वो लतिका लपेट कर जब तुम
निहाल होते थे
चूड़ियां हाथों की डूब जाती थीं कहीं चिड़ियों के स्वर में और
कलाइयां बस प्रेम से लाज़ में लजा जाती थी
वो लतिका भी फिर से आज थिरक रही थी ।।
चाँद की बिंदिया जब आकाश के माथे पर सजती थी
अमलतास भी अपनी लाल चुनर ओढ़ा देते थे मुझे
कहीं आम्र पल्लव गीत सुनाते थे
ऐसे में एक फुनगी तोड़ कर तुम
कानों में लटका देते थे
सुखी हुयी अमलतास की बालियां
फिर बुला रही हैं तुम्हें ।।
- मीनाक्षी मिश्रा
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