आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सुना रहा था

                
                                                         
                            शमा जमाना बुझा रहा था
                                                                 
                            
हमें हवा से जला रहा था

नफ़ा नहीं था वहां ज़रा सा
दुकान फिर भी चला रहा था

दवा, दुआ सब लिए हुए
शरीर अच्छा सज़ा रहा था

उसे नुमाइश पसंद था पर
ख़ुदा खुदाई दिखा रहा था

थमा रहा मैं, यहां उसका
अवाज़ मन से बुला रहा था

जुदा हुई शहर,बाद हमसे
हमें खुदा यूं मिला रहा था

जिसे कहना पता नहीं वो
जुबां हमारा दबा रहा था

सुनी हुई जो गली हमारी
सबा वहां पास आ रहा था

भला किसे फ़िक्र थी हमारी
जिसे देखो वो सुना रहा था

'जयंत' भी कम नहीं दीवाना
धुंआ जुबां से उड़ा रहा था

-जयंत पटेल

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर