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फ़क़ीर

Fakir
                
                                                         
                            इक फ़क़ीर मस्तमौला, मिज़ाज़ है बिंदास
                                                                 
                            
चाह न जमीं जर जोरू, न भगवा है लिबास।

भोजन में न हरी साग, न मछली न ही मांस
आवश्यकता नहीं कुछ है प्रभु उसके पास।

दिखावा न रंग न रूप, बस तन पे है सांस
त्याग दिया मोह माया, है ज्ञान की प्यास।

- जयंत पटेल

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8 वर्ष पहले

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