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कविता: पुल का पुनर्जन्म

                
                                                         
                            कविता: पुल का पुनर्जन्म
                                                                 
                            

जीर्ण-क्षीण काठ के पुल
का रोदन
जैसे वृद्ध जीवन में यादों
का शोधन।
संस्कारों के पुल पर बंधी
कई यादें,
जहाँ काठ के पुल पर जोड़े
करते थे बातें,
अभिलाषा है, नया पुल सजे
बनके दूल्हे राजा,
सजकर आएगा नूतन पुल पर
लेकर बैंड बाजा,
विछोह की वेला में
न अश्रुधारा बहाना,
होंगे पुलकित सब देख
नया नजारा।
पक्के पुल पर मिलकर बैठेंगे
सब हमजोली,
गाएँगे- नाचेंगे मदमस्त
खेलेंगे जैसे होली ॥
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एक घंटा पहले

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