कविता: हिलोरें
सिंधु तट पर, खड़ा था मैं -
मानस मिलने की चाहत में ।
दिल जो दे बैठा, प्यार तेरा पाने की -
बड़ी चाहत थी इस चाहत में।
रोक न पाता खुद को मैं,
जब-जब आती तू तट पर।
देख वेग गति तेरी,
धड़क उठता दिल इस कदर ।
वेग तेरा पकड़ न पाता मैं,
हार गया तुझसे बाज़ी में ।
भाव समझाती थीं हिलोरें तेरी
नासमझी में लिप्त कल्पना मेरी ।
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