मां की ममता कितनी गहरी
कितनी ऊंची किसने जाना
करना चाहें यदि नाप इसकी
छोटा होता हर पैमाना
यदि करें बराबर सागर के
सागर गहरा करना होगा
समतुल्य करें यदि अम्बर के
अम्बर को भी उठना होगा
जिस तरह भार सब सह कर भी
सब कुछ देती है ये अवनी
संतान हेतु सारे दुख सह
हर दम प्रसन्न दिखती जननी
सारी दौलत सारा वैभव
हो चाहे ये सम्पूर्ण जहां
हो जाता सब कुछ अर्थ हीन
निज गोद में जब लेती है मां
चूमती स्नेह से बार - बार
अरु बालों को सहलाती है
वो दृश्य देख निज आन भूल
तब जन्नत भी झुक जाती है
न जाने कितनी रातें जग
हमको पयपान कराया है
खुद सिकुड़ी रह कर गीले में
सूखे में हमें सुलाया है
रोता सुन ले यदि थोड़ा भी
दौड़ती चली वो आती है
"क्या हुआ मेरे बेटे?"ये कह
फिर छाती से चिपकाती है
छाती से चिपका हुआ मुझे
एक हाथ से लेती है संभाल
दूसरे हाथ से अश्रु पोंछ
कहती रोओ मत मेरे लाल
पढ़ लिख कर धन अर्जन खातिर
घर छोड़ के जब हम चलते हैं
लाचार विवश उसकी आंखों से
अविरल अश्रु लुढ़कते हैं
घिरता जब घोर निराशा में
मुश्किल में भरता हूं आहें
मुश्किल होती है शिथिल तब
जब लेती समेट मां की बाहें
अब बोलो सब मिलकर सोचो
मां के प्रति क्या बनता है फ़र्ज़
क्या दे दें क्या कर दें जिस से
चुकता हो सके ये महा कर्ज़।
- जय राम सिंह सेंगर
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