मैं तन्हा हूँ वस तन्हा
अपने भी तो कोई साथ हो
कहना पडे उन्हें खुद आकर मुझसे
काश ऐसे भी कभी कोई वात हो
चांदनी-ए-वदन चुमूं नजरों से
हमारे यहां ऐसी भी तो कोई रात हो
जिसे भरी महफिल रुस्वा किया हो
तुम्ही कहो उसकी फिर क्या औकात हो
किसी के आगे हाथ फैलाऊं
खुदा न करे ऐसे भी कभी हालात हों
पत्थर हैं फूल सभी अपने लिए
फिर कोई क्या दे मुझे जो सौगात हो
जल चूका है आशियां-ए-तलिस्म
अव क्या लेना जो वरसात हो
किसी की खातिर दिवाना वन जाऊं
ऐसे न कभी मेरे ज्जवात हों
उक्ता गया हूं जी-जीकर खुदा करे
जल्दी-जल्दी मौत से मुलाकात हो
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