आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जल्दी-जल्दी मौत से मुलाकात हो

                
                                                         
                            मैं तन्हा हूँ वस तन्हा
                                                                 
                            
अपने भी तो कोई साथ हो

कहना पडे उन्हें खुद आकर मुझसे
काश ऐसे भी कभी कोई वात हो

चांदनी-ए-वदन चुमूं नजरों से
हमारे यहां ऐसी भी तो कोई रात हो

जिसे भरी महफिल रुस्वा किया हो
तुम्ही कहो उसकी फिर क्या औकात हो

किसी के आगे हाथ फैलाऊं
खुदा न करे ऐसे भी कभी हालात हों

पत्थर हैं फूल सभी अपने लिए
फिर कोई क्या दे मुझे जो सौगात हो

जल चूका है आशियां-ए-तलिस्म
अव क्या लेना जो वरसात हो

किसी की खातिर दिवाना वन जाऊं
ऐसे न कभी मेरे ज्जवात हों

उक्ता गया हूं जी-जीकर खुदा करे
जल्दी-जल्दी मौत से मुलाकात हो

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर