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प्यास

                
                                                         
                            क्यों बेनूर है
                                                                 
                            
तेरी आत्मा
क्यों
उदास रहने लगी है
तू आजकल

मैंने देखीं हैं अमावस की रात
खण्डर में चमकती दो आँखें
वीराने में धीरे धीरे
गुम होता उजाला

मैं रेगिस्तान जो ठहरा
तू मेरी अतुर्पति प्यास ही तो है

तु मैं और ये
अमिट पीड़ा
आ एक साथ जी लें

मैं अकेला कैसे चलूँ
तन्हाई की तपस लिए

मैं तो रेगिस्तान हूँ
और तू मेरी भटकती
प्यास है
लौट आ अब
प्यास के बिन
कैसे जिए रेगिस्तान।
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एक वर्ष पहले

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