जलाने वाले, जलाने आए
रिवाज़-ए-दुनिया निभाने आए
सहारा देने कभी न पहुँचे
जनाज़ा मेरा उठाने आए
अँधेरों में जो रखे थे अब तक
दिए क़ब्र पे जलाने आए
परिंदे तो उड़ चुके हैं कब के
किसे वो मातम दिखाने आए
हँसी भी थोड़ी, नमी भी थोड़ी
वो झूठे आँसू बहाने आए
कफ़न की सिलवटों पे नाम लिखकर
वो अपने रिश्ते भुनाने आए
- डी एम मिश्र
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