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नज़्म - दम खम

                
                                                         
                            मेरे मुक़द्दर की है ये सभी रानाईया
                                                                 
                            
ये उजाले अंधेरे ग़म ए परछाईया

अभी तो होश में आया था उल्फ़त ए नशा से
फिर होश उड़ा गई ज़ालिम की अंगड़ाईया

चाहता था ये ज़ख्म भर जाए अब
नासूर कर गए ज़ख्म बे काम दवाईया

हासिल करनी थी परसाई मुझको
गले आ पड़ी ज़माने कि रुसवाईया

अभी तो ख़्वाब देखें थे महलों के मैंने
अभी सपने तोड़ गई बढ़ती महंगाईया

हर पल रहती थी नूर उजालों में साथ मेरे
होते ही अंधेरा छोड़ गई मुझको परछाईया

 
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45 मिनट पहले

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