बहुत ज्यादा होशियार बनना,
हर किसी को कम समझना,
खुद को सबसे स्याना बताना—
कभी-कभी यही आदत
इंसान को भीतर से हराने लगती है।
उसे पता भी नहीं चलता,
कि अपने ही हाथों से
वह अपनी राह में
कितनी दीवारें चुन रहा है।
वह सफलता के दरवाज़े पर खड़ा होकर,
अपनी ही सोच की चाबी खो देता है,
और फिर किस्मत को दोष देकर
अपनी हार का जश्न मनाता है।
बहता हुआ पानी कभी नहीं रुकता,
पर जब वही अपने रास्ते में
पत्थर जमा करने लगे,
तो उसकी गति भी थम जाती है।
इंसान भी कुछ ऐसा ही है—
जब अहंकार रास्ता बन जाए,
और “मैं ही सही हूँ”
उसकी पहचान बन जाए,
तो मंज़िल दूर नहीं होती…
बस इंसान खुद अपनी मंज़िल से दूर हो जाता है।
कभी दूसरों को हराने की कोशिश में,
वह खुद से ही हार जाता है,
कभी अपनी अकड़ के कारण
वह उन हाथों को ठुकरा देता है
जो उसे ऊपर उठाना चाहते थे।
फिर उम्र गुजरती रहती है…
शिकायतें बढ़ती रहती हैं…
और वह कहता रहता है—
“मेरी किस्मत खराब थी।”
काश!
एक बार आईना देखकर पूछता—
“मेरी राह में सबसे बड़ा पत्थर कौन था?”
शायद जवाब मिलता—“कोई और नहीं…
तुम खुद।”
याद रखना—
सफलता को हमेशा दुश्मन नहीं हराता,
कई बार इंसान का अहंकार ही
सबसे बड़ा हत्यारा बन जाता है।
इसलिए थोड़ा झुक जाना,
थोड़ा सुन लेना,
कभी अपनी गलती भी मान लेना…
क्योंकि—
पेड़ जितना फलता है,
उतना ही झुकता है,
और नदी जितनी गहरी होती है,
उतनी ही शांत बहती है।
अहंकार दीवारें खड़ी करता है,
विनम्रता रास्ते खोलती है।
और अंत में…
अपनी असफलता के लिए
दुनिया को दोष देने से पहले,
एक बार खुद से पूछ लेना—
कहीं मेरी सोच ही
मेरी मंज़िल की सबसे बड़ी बाधा तो नहीं?
— तारेश ‘अजनबी’
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