नहीं साधारण शिल्पी वो, नहीं केवल बढ़ई का नाम,
ऋग्वेद गाता है उन्हें, सृष्टि के आदि भगवान।
दशम मंडल में दो सूक्त हैं, इक्यासी और बयासी नाम,
चौदह ऋचाओं में गूँजता, विश्वकर्मा का धाम।
जिनके ऋषि भी वही हैं, देवता भी वही महान,
"यो विश्वं सर्वकर्म" हैं, वही करते सब काम।
जो सब कुछ करने वाला, वही विश्वकर्मा कहलाए,
आकाश और पृथ्वी जिनसे, सारे देवता बनाए।
हर दिशा में देखते हैं वो, हर मुख उनका ही रूप,
हर भुजा और हर चरण में, वो ही हैं अनूप।
अपनी भुजाओं के बल से, पंखों से उन्होंने ताना,
धरती और अम्बर का, अद्भुत जाल बिछाना।
कला, वास्तु, विज्ञान की, जड़ हैं जिनके हाथ,
सृजन ही सबसे बड़ा कर्म, जिनकी है सौगात।
पुराणों में देव-शिल्पी कहे, पर वेद में स्पष्ट ज्ञान,
विश्वकर्मा ही परब्रह्म हैं, सृष्टिकर्ता भगवान।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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