आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विश्वकर्मा ही परब्रह्म

                
                                                         
                            नहीं साधारण शिल्पी वो, नहीं केवल बढ़ई का नाम,
                                                                 
                            
ऋग्वेद गाता है उन्हें, सृष्टि के आदि भगवान।
दशम मंडल में दो सूक्त हैं, इक्यासी और बयासी नाम,
चौदह ऋचाओं में गूँजता, विश्वकर्मा का धाम।

जिनके ऋषि भी वही हैं, देवता भी वही महान,
"यो विश्वं सर्वकर्म" हैं, वही करते सब काम।
जो सब कुछ करने वाला, वही विश्वकर्मा कहलाए,
आकाश और पृथ्वी जिनसे, सारे देवता बनाए।

हर दिशा में देखते हैं वो, हर मुख उनका ही रूप,
हर भुजा और हर चरण में, वो ही हैं अनूप।
अपनी भुजाओं के बल से, पंखों से उन्होंने ताना,
धरती और अम्बर का, अद्भुत जाल बिछाना।

कला, वास्तु, विज्ञान की, जड़ हैं जिनके हाथ,
सृजन ही सबसे बड़ा कर्म, जिनकी है सौगात।
पुराणों में देव-शिल्पी कहे, पर वेद में स्पष्ट ज्ञान,
विश्वकर्मा ही परब्रह्म हैं, सृष्टिकर्ता भगवान।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर