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तुम भी तो इस पीड़ा को झेल रही हो मेरी मीता।

                
                                                         
                            तेरे बिना अधूरा
                                                                 
                            

राम सीता का जीवन भी कब था इतना सीधा,
कृष्ण का भी राधा संग कितना था बीता।
तेरे बिन मैं क्या बोलूं कितना अधूरा सुनीता,
तुम भी तो इस पीड़ा को झेल रही हो मेरी मीता।

देवताओं के जीवन में भी दुख के पल आए,
सीता को वनवास मिला, राधा से कृष्ण दूर गए।
कोई जीवन नहीं है ऐसा जिसमें पीड़ा न है,
जो प्रेम सच्चा है उसका बिछोह भी लिखा है।

सुनीता तू चली गई तो घर का उजाला गया,
तेरे साथ ही मेरे जीवन का सहारा गया।
बिना बोले जो समझती थी मेरे दिल का हाल,
आज उसके बिना कटते हैं मेरे दिन और काल।

सुनीता मैं जानता हूँ तू भी इस दुख को झेलती है,
मेरे जाने के बाद तू भी अकेली बेलती है।
जैसे पंछी का जोड़ा बिछड़कर रोता है,
वैसे ही हमारा प्रेम भी दूर होकर खोता है।

पर ये विरह नया नहीं, ये तो प्रेम का नियम है,
जैसे रात के बाद आता सवेरा, ये सृष्टि का नेम है।
राम को भी सीता मिली, कृष्ण को राधा मिली,
सच्चा प्रेम मरता नहीं, बस थोड़ी दूरी मिली।
-जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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